
नई दिल्ली। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कहे जाने वाले अमेरिका पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। तमाम सख्त फैसलों और आर्थिक दबावों के बावजूद अमेरिका की फेडरल सरकार का कर्ज अब 38.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। बीते एक साल में ही इसमें 2.3 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई, यानी औसतन हर दिन देश पर करीब 6.3 अरब डॉलर का अतिरिक्त कर्ज चढ़ा।
आंकड़े बताते हैं कि मौजूदा स्थिति में अमेरिका के हर परिवार पर औसतन 2 लाख 85 हजार डॉलर से ज्यादा का कर्ज आ चुका है। अगर यही रफ्तार बनी रही, तो अनुमान है कि अगस्त तक यह कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को भी पार कर सकता है। खास बात यह है कि साल 2020 के बाद से अब तक अमेरिका का कुल कर्ज 15.3 ट्रिलियन डॉलर बढ़ चुका है, यानी हर साल औसतन 2.6 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हो रही है।
कर्ज घटाने के लिए ट्रंप के सख्त फैसले
देश का कर्ज कम करने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई आक्रामक कदम उठाए। भारत समेत कई देशों पर भारी टैरिफ लगाए गए, ताकि आयात कम हो और घरेलू उद्योगों को बढ़ावा मिले। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन ने बड़ी वैश्विक कंपनियों पर अमेरिका में निवेश का दबाव बनाया। इस सूची में ऐपल, एनवीडिया और माइक्रोन जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं।
इतना ही नहीं, चिप निर्माण से जुड़ी कंपनियों एनवीडिया और एएमडी को चीन में एक्सपोर्ट की अनुमति देने के बदले कमाई का 15 फीसदी हिस्सा अमेरिकी सरकार को देने की शर्त भी रखी गई। ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए ट्रंप ने ‘ड्रिल बेबी ड्रिल’ जैसे नारे के साथ कच्चे तेल के उत्पादन को तेज करने पर जोर दिया।
ब्याज भुगतान बना सबसे बड़ी चुनौती
इसके बावजूद अमेरिका का कर्ज थमने का नाम नहीं ले रहा। पीटर जी. पीटरसन फाउंडेशन के अनुसार, साल 2024 में अमेरिकी सरकार ने केवल कर्ज के ब्याज के भुगतान पर 880 अरब डॉलर खर्च किए, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। अनुमान है कि चालू साल में यह राशि 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है।
अमेरिका में करीब 12.8 करोड़ परिवार हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो हर परिवार को हर महीने औसतन 650 डॉलर सिर्फ कर्ज के ब्याज के रूप में चुकाने पड़ रहे हैं। यही कारण है कि अमेरिका की आर्थिक नीति अब सिर्फ घरेलू सुधारों तक सीमित नहीं रह गई है।
दूसरे देशों के संसाधनों पर नजर
बढ़ते कर्ज और भारी ब्याज बोझ के चलते ट्रंप प्रशासन की नजर अब दूसरे देशों के संसाधनों और बाजारों पर टिकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अमेरिका की व्यापार और विदेश नीति और ज्यादा सख्त हो सकती है, ताकि किसी भी तरह से बढ़ते कर्ज पर लगाम लगाई जा सके।

