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    घर खरीदारों की सोसायटी को झटका, दिवालिया प्रक्रिया में दखल पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

    सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट से जुड़े दिवालिया मामलों में एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि जब कोई बैंक या वित्तीय संस्था किसी डेवलपर के खिलाफ IBC के सेक्शन-7 के तहत कार्यवाही शुरू करती है, तो रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) या कोई सोसायटी इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया केवल लेनदार और कर्जदार के बीच की होती है।

    थर्ड पार्टी को न ट्रायल में अधिकार, न अपील में

    जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि सेक्शन-7 के तहत शुरू हुई कार्यवाही में RWA जैसी थर्ड पार्टी को न तो पहली अदालत में और न ही अपील के स्तर पर सुनवाई का अधिकार है। कोर्ट के मुताबिक, RWA न तो खुद कर्ज देने वाली संस्था है और न ही कानून उसे खरीदारों का अधिकृत प्रतिनिधि मानता है।

    खुद कर्जदार होने पर ही दावा संभव

    अदालत ने स्पष्ट किया कि घर खरीदारों को IBC के तहत वित्तीय लेनदार माना गया है, लेकिन यह दर्जा किसी सोसायटी या एसोसिएशन को तब तक नहीं मिल सकता, जब तक वह स्वयं कर्जदार न हो। कोर्ट ने कहा कि एक सोसायटी अपने सदस्यों से अलग एक कानूनी इकाई होती है और बिना प्रत्यक्ष वित्तीय दावे के वह लेनदार नहीं बन सकती।

    कानून का दायरा बढ़ने की आशंका

    सुप्रीम कोर्ट ने चेताया कि यदि RWA को शुरुआत में ही दखल की अनुमति दी गई, तो इससे कानून का दायरा अनावश्यक रूप से बढ़ जाएगा। इससे डेवलपर अपनी समस्याओं को टालने के लिए सामूहिक हितों का बहाना बना सकते हैं। कोर्ट ने बताया कि दिवालियापन प्रक्रिया शुरू होने के बाद ही घर खरीदारों का सामूहिक प्रतिनिधित्व अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से होता है।

    खरीदारों के हित सुरक्षित रहेंगे

    हालांकि RWA की सीधी दखलंदाजी सीमित कर दी गई है, लेकिन कोर्ट ने जोर देकर कहा कि IBC के तहत घर खरीदारों के हितों की पूरी सुरक्षा की जाती है। भविष्य में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए अदालत ने कुछ दिशानिर्देश भी जारी किए, जिनमें सूचना ज्ञापन में सभी अलॉटीज का विवरण देना और परिसमापन की सिफारिश के लिए ठोस कारण दर्ज करना शामिल है।

    क्या है मामला

    यह फैसला गुजरात के अहमदाबाद स्थित ‘तक्षशिला एलेगना’ परियोजना से जुड़े मामले में आया। डेवलपर ने ईसीएल फाइनेंस से करीब 70 करोड़ रुपये का ऋण लिया था। चूक के बाद यह ऋण एडेलवाइस एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को सौंपा गया, जिसने IBC की धारा-7 के तहत दिवालिया कार्यवाही शुरू की। एनसीएलटी से राहत न मिलने पर एनसीएलएटी ने CIRP शुरू करने का आदेश दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा।

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