
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम आदेश में कहा है कि राज्य सरकार की सेवा में पहले से कार्यरत इन-सर्विस डॉक्टरों पर पोस्ट ग्रेजुएशन (पीजी) के बाद ग्रामीण सेवा बांड लागू नहीं होता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2017 के प्रवेश नियमों का नियम-11 केवल नए चयनित अभ्यर्थियों पर लागू है, न कि उन डॉक्टरों पर जो पहले से सरकारी सेवा में हैं।
याचिकाकर्ता का पक्ष
डा. दीपाली बैरवा ने याचिका दायर कर ग्रामीण सेवा बांड से मुक्त किए जाने और अपने मूल शैक्षणिक प्रमाण-पत्र लौटाने की मांग की थी। उन्होंने मार्च 2017 में एनेस्थीसिया में पीजी डिप्लोमा पूरा किया था। उनका तर्क था कि परिणाम घोषित होने के तीन महीने के भीतर उन्हें ग्रामीण सेवा की कोई पदस्थापना नहीं मिली, इसलिए नियमों के अनुसार बांड स्वतः समाप्त माना जाना चाहिए।
सरकार की दलील
राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता को दिया गया अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) स्पष्ट शर्तों के साथ था, जिसमें सुपर स्पेशियलिटी/पीजी पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद एक वर्ष की अनिवार्य ग्रामीण सेवा का उल्लेख था। साथ ही यह भी बताया गया कि उनके मूल प्रमाण-पत्र पहले ही अंतरिम आदेश के तहत लौटा दिए गए थे।
कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता पहले से ही रतलाम में मेडिकल ऑफिसर के रूप में कार्यरत थीं और यह महत्वपूर्ण तथ्य उन्होंने याचिका में छिपाया। इस आधार पर याचिका को निरस्त कर दिया गया। हालांकि, अदालत ने अपने आदेश में यह महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट कर दिया कि इन-सर्विस डॉक्टरों पर पीजी के बाद ग्रामीण सेवा बांड का नियम लागू नहीं होता।
इन-सर्विस डॉक्टरों के लिए संदेश
इस फैसले से प्रदेश के उन डॉक्टरों को बड़ी राहत मिली है, जो पहले से सरकारी सेवा में रहते हुए पीजी करते हैं। हाई कोर्ट की यह व्याख्या भविष्य में ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में काम करेगी।

