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    रफ्तार कम हुई, मजबूरी नहीं: गिग वर्कर्स बोले—जमीन पर कुछ नहीं बदला

    न्यूज़ डेस्क, भोपाल: केंद्र सरकार द्वारा क्विक कॉमर्स कंपनियों को 10 मिनट में डिलीवरी का दावा हटाने के निर्देश के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि गिग वर्कर्स को राहत मिलेगी, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। दिल्ली समेत कई शहरों में काम कर रहे डिलीवरी एजेंट्स का कहना है कि इस फैसले से उनकी ज़िंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। उनकी कमाई अब भी ज्यादा डिलीवरी करने पर निर्भर है, इसलिए तेज़ी से काम करने का दबाव पहले जैसा ही बना हुआ है। कई एजेंट्स ने यह भी बताया कि उन्हें कंपनियों की ओर से इस बदलाव को लेकर कोई औपचारिक सूचना तक नहीं मिली है।

    डिलीवरी एजेंट्स के अनुसार प्रति डिलीवरी भुगतान ₹15 से ₹25 के बीच होता है। रोज़ 35 से 40 डिलीवरी करने के बाद ही ₹1,200 से ₹1,500 की कमाई हो पाती है, जबकि लगभग 15 घंटे काम करने पर यह राशि ₹1,500 से ₹1,600 तक पहुंचती है। एजेंट्स का कहना है कि ज्यादा कमाई और इंसेंटिव पाने के लिए उन्हें कई बार गलत साइड में वाहन चलाना पड़ता है और अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती है।

    कंपनियां भले ही यह दावा करें कि अब किसी तय समय सीमा में डिलीवरी की बाध्यता नहीं है, लेकिन गिग वर्कर्स का कहना है कि इंसेंटिव सिस्टम ही असली दबाव बन चुका है। उनकी रेटिंग और अतिरिक्त कमाई इस बात पर निर्भर करती है कि वे कितनी जल्दी और कितनी ज्यादा डिलीवरी करते हैं। कई बार इंसेंटिव दिन में दो-तीन बार बदल जाते हैं, जो मांग, मौसम और त्योहारों पर निर्भर होते हैं। अगर किसी दिन ऑर्डर कम हुए तो कई घंटे काम करने के बावजूद कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं मिलता।

    एक डिलीवरी पार्टनर का कहना है, “अच्छा है कि सरकार हमारी आवाज़ सुन रही है, लेकिन यह काफी नहीं है। जब तक सुरक्षित और तय भुगतान व्यवस्था नहीं बनती, हमारी लड़ाई जारी रहेगी।” Amazon India Workers Union के राष्ट्रीय अध्यक्ष धर्मेंद्र कुमार ने भी सरकार के कदम का स्वागत किया, लेकिन साफ कहा कि इससे कंपनियों का बिज़नेस मॉडल नहीं बदलता। उनके मुताबिक अब भी न न्यूनतम वेतन है, न बीमा और न ही सुरक्षा की ठोस व्यवस्था। वर्कर्स को बेहतर रेटिंग और इंसेंटिव के लालच में 10 से 12 घंटे तक काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।

    कुल मिलाकर, 10 मिनट डिलीवरी का टैग हटना एक सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन गिग वर्कर्स के लिए असली राहत तब मिलेगी, जब उन्हें न्यूनतम वेतन, बीमा और स्थायी आय की गारंटी मिलेगी। फिलहाल उनके लिए दबाव और जोखिम दोनों पहले जैसे ही बने हुए हैं।

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