
EU–भारत व्यापारिक समझौते को एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल ट्रेड’ नाम दिया गया है। इस डील के तहत कई अहम समझौते हुए हैं, जिससे भारत को वैश्विक व्यापार में नए अवसर मिलेंगे। हालांकि, इस समझौते के बाद कुछ सेक्टरों में पहले से स्थापित उद्योगों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। इनमें सबसे बड़ा असर ऑटोमोबाइल सेक्टर पर दिखेगा, जहाँ विदेशी और घरेलू कंपनियों के बीच सीधा मुकाबला होगा।
महंगी विदेशी कारें होंगी सस्ती
अभी भारत में यूरोप से आने वाली कारों पर 70 से 110 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगता है, इसी वजह से BMW, Mercedes और Volkswagen जैसी कारें आम खरीदार की पहुंच से बाहर रहती हैं। EU–India ट्रेड डील के बाद इस टैक्स को चरणबद्ध तरीके से घटाकर लगभग 10 प्रतिशत तक लाने की योजना है। इससे विदेशी कारों की कीमतों में सीधी कमी आएगी और बाजार में उनकी उपलब्धता बढ़ेगी।
ग्राहक को मिलेगा सीधा फायदा
टैक्स कम होने से कार खरीदने वालों को बड़ा लाभ होगा। छोटी और मिड-रेंज लग्ज़री कारें 10–20 प्रतिशत तक सस्ती हो सकती हैं, जबकि हाई-एंड कारों की कीमतों में 20–30 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड ज्यादा लोगों के बजट में आएंगे और ग्राहकों को बेहतर सेफ्टी, नई टेक्नोलॉजी और अधिक विकल्प मिलेंगे।
घरेलू कंपनियों के लिए असली चुनौती
अब तक भारी टैक्स के कारण विदेशी कारें महंगी थीं और Tata, Maruti व Mahindra जैसी घरेलू कंपनियों का बाजार सुरक्षित था। लेकिन कीमतें घटते ही ग्राहक विदेशी कारों की ओर भी रुख करेंगे। इससे घरेलू कंपनियों पर अपनी गुणवत्ता, फीचर और कीमत में तेजी से सुधार करने का दबाव बढ़ेगा। जो कंपनियाँ समय रहते खुद को नहीं बदलेंगी, उनका बाजार हिस्सा घटने का खतरा रहेगा।
यह डील उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद है, लेकिन भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के लिए यह असली परीक्षा साबित होने वाली है।
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