आज 25 दिसंबर है। देश पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती मना रहा है। मध्यप्रदेश से लेकर दिल्ली तक, सभाओं, संगोष्ठियों और सोशल मीडिया श्रद्धांजलियों का दौर जारी है। देश उन्हें एक कुशल प्रधानमंत्री, ओजस्वी वक्ता और संवेदनशील कवि के रूप में याद कर रहा है।
लेकिन अटल जयंती पर एक सवाल बार-बार मन में उठता है—क्या अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ दिल्ली की राजनीति के नेता थे?
इस सवाल का जवाब साफ है—नहीं।
अटल सिर्फ सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाले नेता नहीं थे, बल्कि उनकी राजनीतिक चेतना, सोच और संस्कार मध्यप्रदेश की मिट्टी में गहरे धंसे हुए थे।
ग्वालियर: जहां अटल का सिर्फ जन्म नहीं, दृष्टि भी गढ़ी गई
25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी के लिए यह शहर केवल जन्मस्थान नहीं था। यह उनकी राजनीतिक सोच की पहली प्रयोगशाला था।
ग्वालियर की सामाजिक विविधता, सांस्कृतिक चेतना और वैचारिक माहौल ने अटल को भीड़ से अलग नेता बनाया। यहां उन्होंने सीखा कि राजनीति सिर्फ सत्ता का खेल नहीं, बल्कि समाज को समझने की कला है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि अटल ने शुरुआती दौर में ग्वालियर और चंबल अंचल में जनसंघ को खड़ा करने के लिए लगातार यात्राएं कीं—बिना संसाधन, बिना संगठन और बिना सत्ता।
कई बार तो वे साइकिल पर गांव-गांव घूमते रहे। उस समय उनके पास न पद था, न पहचान—था तो सिर्फ विचार और प्रतिबद्धता।
संसद से पहले मध्यप्रदेश बना अटल का कर्मक्षेत्र
1957 में संसद पहुंचने से पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने मध्यप्रदेश को अपना राजनीतिक प्रयोगक्षेत्र बनाया।
यहीं उन्होंने राजनीति को भाषणों से नहीं, व्यवहार से सिखाया। कार्यकर्ताओं को आदेश से नहीं, उदाहरण से जोड़ा।
राजनीतिक इतिहासकार मानते हैं कि अगर आज भाजपा एक कैडर-बेस्ड पार्टी है, तो उसकी नींव अटल युग में मध्यप्रदेश से ही पड़ी।
भोपाल के भाषण और गरिमामय राजनीति की पाठशाला
भोपाल में दिए गए अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण आज भी राजनीतिक संवाद की मिसाल माने जाते हैं।
यहीं उन्होंने कहा था—
“विरोध भी गरिमा के साथ होना चाहिए।”
कम ही लोग जानते हैं कि भोपाल में उनके भाषणों की भाषा, लय और भाव को स्थानीय बुद्धिजीवियों के साथ बैठकर तराशा गया। वही शैली आगे चलकर संसद में उनकी पहचान बनी—कटाक्ष में भी शालीनता और विरोध में भी मर्यादा।

नेतृत्व गढ़ने की प्रयोगशाला बना मध्यप्रदेश
अटल ने मध्यप्रदेश को कभी सिर्फ वोट बैंक नहीं माना। उन्होंने यहां नेतृत्व तैयार किया।
कुशाभाऊ ठाकरे को संगठन की कमान देना, सुंदरलाल पटवा और कैलाश जोशी जैसे नेताओं को वैचारिक संरक्षण देना—ये फैसले बताते हैं कि अटल सत्ता से पहले संगठन को महत्व देते थे।
उनकी राजनीति व्यक्ति-केंद्रित नहीं, विचार-केंद्रित थी।
प्रधानमंत्री रहते हुए भी एमपी से भावनात्मक जुड़ाव
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अटल का मध्यप्रदेश से रिश्ता औपचारिक नहीं रहा।
नर्मदा परियोजना, आदिवासी पुनर्वास और बुंदेलखंड जैसे मुद्दों पर वे सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं रहे।
अफसरों के मुताबिक,
“अटल जी जमीन की सच्चाई देखना चाहते थे, सिर्फ नोटशीट नहीं।”
कवि अटल की रचनाओं में भी बसता है मध्यप्रदेश
अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं में जो करुणा, मौन और आत्मसंघर्ष दिखाई देता है, उसका बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश के सामाजिक अनुभवों से उपजा माना जाता है।
ग्वालियर की संस्कृति, भोपाल का बौद्धिक माहौल और विंध्य-बुंदेलखंड का संघर्ष—इन सबकी छाप उनकी कविताओं में साफ दिखती है।
अटल जयंती पर आत्ममंथन का समय
आज अटल जयंती पर जहां कार्यक्रम हो रहे हैं, वहीं मध्यप्रदेश के लिए यह आत्ममंथन का भी अवसर है।
क्या आज की राजनीति अटल जैसी संयमित है?
क्या संवाद में वही गरिमा बची है?
कहना होगा कि अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ एक व्यक्ति नहीं थे, वे राजनीति की एक संस्कृति थे—और उस संस्कृति की सबसे गहरी जड़ें मध्यप्रदेश में थीं।

