अरावली खनन विवाद: इन दिनों अरावली नेशनल इशू बनकर उभरी है। चाहे फिर मेनस्ट्रीम मीडिया हो या सोशल मीडिया, हर जगह इस पर बात हो रही है। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की अरावली को लेकर 100 मीटर वाली परिभाषा को स्वीकार कर लिया है। खास बात यह है कि इसी परिभाषा को सर्वोच्च न्यायालय ने 10 साल पहले खारिज कर दिया था।

क्या था मामला
अरावली में अवैध खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी और सरकार ने परिभाषा दी थी कि किन पहाड़ियों को अरावली माना जाएगा। सरकार की ओर से तर्क दिया गया था कि जमीन के स्तर से 100 मीटर से ऊँचे हिस्से ही अरावली पहाड़ियाँ मानी जाएँ। इस परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। अदालत ने भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) को निर्देश दिया था कि वह अदालत की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) और राजस्थान सरकार के सहयोग से राज्य में स्थित पूरी अरावली पर्वत श्रृंखला का सैटेलाइट इमेजरी के आधार पर आकलन करे।
अब कोर्ट का नया फैसला
हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने 100 मीटर वाली परिभाषा को मंजूरी दे दी है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा है कि नई खनन लीज़ (Mining Leases) नहीं दी जाएँगी, जब तक एक विस्तृत सतत खनन योजना (Management Plan for Sustainable Mining) तैयार नहीं हो जाती। पुराने वैध खनन जारी रह सकते हैं, लेकिन सख्त पर्यावरण मानकों के तहत।
क्या है अरावली विवाद
अरावली पर्वतमाला को लेकर इस समय विवाद इसलिए चल रहा है क्योंकि हरियाणा और राजस्थान में इसके बड़े हिस्से में खनन, रियल एस्टेट और निर्माण गतिविधियों की अनुमति देने या न देने पर टकराव है। पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली को वन क्षेत्र (Forest Land) का दर्जा मिलना चाहिए, क्योंकि यह दिल्ली-NCR में प्रदूषण रोकने, भूजल रिचार्ज और मरुस्थलीकरण से बचाव में अहम भूमिका निभाती है। वहीं, राज्य सरकारें आर्थिक विकास के नाम पर खनन और परियोजनाओं को वैध करने की कोशिश कर रही हैं। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट, पर्यावरण मंत्रालय और राज्य सरकारों के बीच कानूनी और नीतिगत बहस चल रही है, जिससे अरावली का भविष्य एक बड़ा पर्यावरणीय सवाल बना हुआ है।

