
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस में अपने नए वैश्विक मंच ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का ऐलान किया। इस दौरान ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी बोर्ड में शामिल होने का न्योता दिया, लेकिन भारत ने फिलहाल न तो इसे स्वीकार किया और न ही खारिज किया। दिल्ली ने इस पहल पर “देखो और समझो” की नीति अपनाई है।
क्यों हिचक रहा है भारत
सूत्रों के अनुसार, भारत कई पहलुओं पर गंभीरता से विचार कर रहा है—
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बोर्ड में शामिल देशों की सूची
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इसकी वैधता और भविष्य
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संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर असर
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गाज़ा और इज़राइल-फिलिस्तीन मुद्दे पर भारत का रुख
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अमेरिका से संभावित कूटनीतिक दबाव
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीय व्यवस्था का समर्थक रहा है। ऐसे में कोई भी ऐसा मंच जो यूएन के समानांतर ढांचा बने, दिल्ली के लिए असहज हो सकता है।
किन देशों ने दी सहमति
अब तक अर्जेंटीना, सऊदी अरब, मिस्र, इज़राइल, यूएई, तुर्की, जॉर्डन, पाकिस्तान, कतर, इंडोनेशिया सहित कई देशों ने बोर्ड में शामिल होने की सहमति दी है। पश्चिम एशिया के बड़े खिलाड़ी इसमें मौजूद हैं, लेकिन यूरोप के प्रमुख देश—फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन—दूर हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन भी इससे बाहर हैं, जिससे इसकी वैश्विक वैधता पर सवाल उठ रहे हैं।
‘ट्रंप प्रोजेक्ट’ होने की चिंता
दिल्ली की एक बड़ी चिंता यह है कि यह बोर्ड पूरी तरह ट्रंप की व्यक्तिगत पहल है। ट्रंप के कार्यकाल के समाप्त होते ही यह मंच निष्क्रिय हो सकता है। भारत ऐसे अस्थायी मंच पर संसाधन और राजनीतिक पूंजी लगाने से पहले सावधानी बरत रहा है।
संयुक्त राष्ट्र बनाम नया मंच
अगर ‘बोर्ड ऑफ पीस’ संयुक्त राष्ट्र को कमजोर करता है या समानांतर व्यवस्था बनता है, तो यह भारत की बहुपक्षीय नीति के विपरीत होगा। ट्रंप ने जरूर कहा है कि यह बोर्ड यूएन के साथ मिलकर काम करेगा, लेकिन इसके नियम, अधिकार और निर्णय प्रक्रिया अभी स्पष्ट नहीं हैं।
गाज़ा से आगे बढ़ा तो बढ़ेगी चिंता
भारत चाहता है कि यह मंच केवल गाज़ा तक सीमित रहे, जैसा कि कनाडा ने सुझाव दिया है। लेकिन ट्रंप ने इसे “दुनिया के लिए” बताया है। आशंका है कि यह मंच भविष्य में अन्य संघर्षों—यहां तक कि भारत-पाकिस्तान मामलों—में भी दखल दे सकता है।
पाकिस्तान की मौजूदगी, भारत पर दबाव
पाकिस्तान पहले से ही इस बोर्ड में शामिल है और उसके प्रधानमंत्री दावोस समारोह में मौजूद थे। दिल्ली में यह धारणा है कि अगर भारत बाहर रहा, तो भविष्य में किसी भारत-पाक तनाव के दौरान बोर्ड के फैसलों से वह कट सकता है।
संतुलन की राजनीति
भारत के सामने चुनौती स्पष्ट है—
एक ओर, बहुपक्षीयता और दो-राष्ट्र समाधान जैसी अपनी मूल विदेश नीति की रक्षा।
दूसरी ओर, अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्तों को नुकसान से बचाना।
इसी संतुलन के कारण भारत फिलहाल कोई जल्दबाज़ी नहीं कर रहा है और ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर दूर से नजर रखे हुए है।

