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    पत्रकारो का उमड़ा हुजूम …शर्मशार हुई पत्रकारिता…क्या दिया जा रहा है भविष्य का संकेत

    वाह री पत्रकारिता…

    Bhopal press confrence: पत्रकारिता और पत्रकारो का स्तर दिन पे दिन गिरता जा रहा है..यह बात तो गाहे- बगाहे चर्चा मे आती रही है लेकिन पिछले दिनो मोहन सरकार के दो साल पूरे होने पर जो दृश्य देखा या  दिखाया गया वह वाकई मे पत्रकारिता के घिनौने भविष्य को इंगित कर रहा है…मै ये नही लिखना चाहता कि पत्रकारिता आगे आने वाले समय मे इस दृष्य का अनुसरण करती रहेगी…लेकिन पत्रकारो के ही द्वारा जो कृत्य किया जा रहा है उसके बारे मे कम से कम यह  तो कहा ही जा सकता है कि आने वाले समय मे पीत पत्रकारिता भी स्वस्थ पत्राकारिता के मिसाल के तौर पर देखी जायेगी..जी हां अलग अलग विभागो के मंत्रियो द्वारा मोहन सरकार के दो साल के काम काज का बखान करने के लिये प्रेस कांफ्रेस का आयोजन किया गया…स्थान भी अलग अलग थे…मगर भोपाल मे होने वाली प्रेस काफ्रेस मे चेहरे एक जैसे थे….हां कुछ सोचने समझने और उसे पाठको तक परोसने वाले प्राणी भी थे मगर कांफ्रेन्स मे उमड़े हुजूम मे वे ओझल हो गये…खुसपुसाहट तो इस बात की भी हो रही है कि विभाग के ही अफसरो द्वारा ठेके पर पत्रकार भी न्यौते गये थे लेकिन अगर ऐसा था तो प्रेस कांफ्रेन्स करवाने की जिम्मेवारी के ओहदे पर बैठे हुक्मरान क्या कर रहे थे..हालांकि मै उस जगह उपस्थित नही था,,,,हां पिछले कई सालों से इस आदर्श काम के लिये मै जा भी नही रहा हूं…लेकिन जो फुटेज देखने को मिले उससे मै खुद शर्मशार  हो गया अगर चालीस साल पहले इस बात का जरा सा भी आभास होता कि आने वाले समय मे पत्रकारो का यह रुप भी देखने को मिलेगा तो शायद मेरा रास्ता ही कुछ और होता….खैर  जब सवाल ही नहीं हुए तो जबाब खोजना बेमानी होगा….हां जो देखने को मिला उसके लिये….थू…थू…एक थैले के लिये इतना मारा मारी….यह तो दक्षिण के फिल्मो वाला दृष्य था जब नेता अभिनेता गरीब बस्तियो मे राहत सामाग्री वितरण करने जाते है  तो इस तरह के भगदड़ होने के दृष्य फिल्माये जाते है…..अन्त  मे यह लिखने से भी गुरेज नही है ….अब तो बस…बस..बस…

     

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